कसारा–कोपागंज सड़क की बदहाली की गूंज अब संसद में: मऊ के ग्रामीणों को आखिर मिली राहत

उत्तर प्रदेश के मऊ जिले में स्थित कसारा–कोपागंज सड़क कई वर्षों से लोगों की परेशानी का कारण रही है।

यह सड़क कई गांवों को जोड़ती है और हजारों लोगों के दैनिक आवागमन का मुख्य मार्ग है।

लेकिन सड़क की हालत इतनी खराब हो चुकी थी कि ग्रामीणों की शिकायतें स्थानीय दफ्तरों से निकलकर अब देश की संसद तक पहुंच गईं।

बार-बार की मांग और जनदबाव के बाद अंततः इस सड़क की विशेष मरम्मत को मंजूरी मिली।

इससे लोगों में उम्मीद जगी है कि अब उनकी पुरानी समस्या कुछ हद तक कम हो सकेगी।

🔹सड़क की स्थिति वर्षों से बेहद खराब

कसारा–कोपागंज सड़क की कुल लंबाई लगभग 5.5 किलोमीटर है।

यह कोपागंज ब्लॉक के कई गांवों को कसारा बाजार और अन्य मुख्य इलाकों से जोड़ती है।


समस्या की शुरुआत तब हुई जब सड़क का निर्माण वर्षों पहले बेहद खराब गुणवत्ता वाली सामग्री से किया गया।

बारिश, दलदल, और लगातार भारी वाहनों की आवाजाही ने सड़क को पूरी तरह तोड़ दिया।

जगह-जगह बड़े गड्ढे बन गए। कहीं सड़क उखड़ गई और कहीं पर पानी भरने से यातायात मुश्किल हो गया।

लोगों ने बताया कि इस मार्ग से होकर जाना उन्हें रोज़ एक नई चुनौती देता था।

दुर्घटनाओं का खतरा हर समय बना रहता था। स्कूल जाने वाले बच्चे, मरीज, किसानों की गाड़ियाँ और आम यात्री — सभी इस सड़क के कारण परेशान रहे।

अंतिम बार भाजपा सरकार में हुआ था निर्माण

🔹लोग परेशान, पर जिम्मेदार विभाग चुप

इस सड़क की समस्या नई नहीं थी। ग्रामीण कई बार अधिकारियों के पास गए। कई बार लिखित शिकायतें की गईं।

नेताओं को ज्ञापन सौंपे गए। ग्रामीणों ने कहा कि हर बार सिर्फ आश्वासन मिलता था।

हालात इतने बदतर हो गए कि कई लोग मजबूर होकर गांवों के बीच बनी कच्ची पगडंडियों से अपनी बाइकें निकालते थे।

बारिश के मौसम में तो स्थिति और भी खराब हो जाती थी। एंबुलेंस भी कई बार मरीजों तक नहीं पहुंच पाती थी।

सड़क की बदहाली से ग्रामीणों में नाराज़गी बढ़ती जा रही थी।

कई लोगों ने तो सोशल मीडिया पर वीडियो डालकर सरकार का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश की।

🔹आखिर कैसे पहुंचा मामला संसद तक?

स्थानीय लोगों के संघर्ष और मीडिया की कवरेज ने इस मुद्दे को ज्यादा बड़ा बना दिया।

ग्रामीणों की शिकायतें धीरे-धीारे जिला प्रशासन और सार्वजनिक प्रतिनिधियों तक पहुंचीं।

धीरे-धीरे मामला इतना बढ़ गया कि यह दिल्ली संसद तक पहुंच गया।

सांसदों ने इस मार्ग की हालत का मुद्दा उठाया।

बताया गया कि यह सड़क हजारों लोगों की जिंदगी से जुड़ी है और इसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

संसद में चर्चा होने के बाद सरकार को इस दिशा में ठोस कदम उठाना पड़ा।

संबंधित विभाग से रिपोर्ट मांगी गई और मरम्मत की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।

🔹विशेष मरम्मत को मंजूरी मिली

काफी कोशिशों के बाद सरकार ने इस 5.5 किमी लंबे मार्ग की विशेष मरम्मत को मंजूरी दे दी।
इस मरम्मत के लिए एक निर्माण फर्म को अनुबंध दिया गया है।

कुल लागत लगभग 88 लाखरु पये तय की गई है।

अधिकारियों ने बताया कि मरम्मत कार्य 15 दिसंबर से शुरू किया जाएगा।

हालांकि यह मरम्मत सिर्फ “स्पेशल रिपेयर” होगी, यानी सड़क का पूर्ण नवनिर्माण अभी नहीं किया जा रहा।

लेकिन गड्ढों को भरना, सड़क की सतह को ठीक करना और जल निकासी की व्यवस्था सुधारना — इन सभी पर काम होगा।

🔹ग्रामीणों की प्रतिक्रिया: राहत भी, चिंता भी

मरम्मत की मंजूरी से ग्रामीणों में राहत है। उन्हें उम्मीद है कि अब रोज़ाना की मुश्किलें कुछ कम होंगी।
कई लोगों ने कहा कि यदि यह मरम्मत ठीक से हो जाए, तो कम से कम आवागमन सुचारू हो सकता है।

लेकिन कुछ ग्रामीणों ने चिंता भी जताई। उनका कहना है कि सिर्फ मरम्मत से समस्या पूरी तरह हल नहीं होगी।

यह सड़क वर्षों से टूटती रही है, इसलिए इसके लिए पूर्ण पुनर्निर्माण जरूरी है।

फिर भी, वर्षों के इंतजार के बाद सरकार के किसी कदम से लोगों को राहत मिली है।

ग्रामीण इस बार निगरानी भी करना चाहते हैं ताकि काम गुणवत्ता से हो और सड़क कुछ ही महीनों में फिर से न टूटे।

🔹समस्या सिर्फ एक सड़क की नहीं— विकास की भी है

यह घटना सिर्फ एक सड़क की कहानी नहीं है।

यह उस बड़े मुद्दे को भी उजागर करती है कि ग्रामीण क्षेत्रों की बुनियादी सुविधाएँ अक्सर उपेक्षा का शिकार क्यों हो जाती हैं।


गांवों में सड़कें सुधरती हैं, लेकिन उनकी गुणवत्ता कम होती है, जिससे कुछ समय बाद फिर वही हालत बन जाती है।

कसारा–कोपागंज सड़क का मामला इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है क्योंकि यह दर्शाता है कि जब स्थानीय स्तर पर समस्या नहीं सुलझती, तो लोगों को मजबूर होकर अपनी आवाज़ को ऊँचा करना पड़ता है। जब तक वह आवाज़ संसद तक नहीं पहुंची, किसी ने गंभीरता से संज्ञान नहीं लिया।

🔶निष्कर्ष

कसारा–कोपागंज सड़क की मरम्मत की मंजूरी उस लंबे संघर्ष का परिणाम है, जो ग्रामीणों ने कई वर्षों से झेला है।

अब जब सड़क के सुधार की प्रक्रिया शुरू होने जा रही है, लोगों को राहत की उम्मीद है।

समस्या का स्थायी समाधान तभी संभव होगा, जब सड़क का पूर्ण नवनिर्माण किया जाए और निर्माण की गुणवत्ता पर सख्त निगरानी रखी जाए।
इसके बावजूद यह कदम ग्रामीणों के लिए एक सकारात्मक शुरुआत है और यह दिखाता है कि जनता की आवाज़, चाहे छोटी हो, अगर लगातार उठे तो देश के सर्वोच्च मंच तक पहुंच सकती है।

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